कुछ दिन पहले मैं एक आर्टिकल पढ़ रही थी जिसमें एक बहुत दिलचस्प बात लिखी थी।
उसमें बताया गया था कि वैज्ञानिकों के अनुसार हर इंसान एक सुपरपावर के साथ पैदा होता है। यह सुपरपावर कोई जादुई शक्ति नहीं है, बल्कि जिज्ञासा (Curiosity) है।
आर्टिकल में यह भी लिखा था कि लगभग 4 साल की उम्र तक एक बच्चा Average 300 सवाल रोज़ पूछता है। लेकिन 10 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते यह संख्या काफी कम हो जाती है। आर्टिकल के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—स्कूल का दबाव, सही जवाब देने की चिंता, गलत होने का डर और कई बार बड़े लोगों का यह रवैया कि बच्चों के हर सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं है।
यह पढ़कर मैं सोचने लगी कि क्या सच में बच्चों की जिज्ञासा कम हो जाती है?
मुझे ऐसा नहीं लगता।
अगर आपने कभी किसी छोटे बच्चे के साथ समय बिताया है तो आप जानते होंगे कि उनके पास हर चीज़ को लेकर सवाल होते हैं।
“चाँद दिन में क्यों दिख रहा है?”
📣 Loved what you read? Want to go deeper into conscious parenting? ✨ The Power of Manifestation in Parenting is now available — A soulful guide packed with real-life tools like affirmations, energy shifts, and sleep talk that I personally use with my son, Hitarth. 💛 Start your journey toward calmer, connected parenting today. 🎉 Launch Offer: Only ₹99 (limited-time price!) 📲 Instant download. No waiting. 👉 Grab your copy now!.
“पक्षी नीचे क्यों नहीं गिरते?”
“पेड़ों को प्यास लगती है क्या?”
कई बार तो उनके सवाल सुनकर हमें हँसी भी आ जाती है। लेकिन अगर ध्यान से देखें तो यही सवाल उनकी सीखने की इच्छा को दिखाते हैं। वे दुनिया को समझना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि चीज़ें कैसे काम करती हैं।
मुझे लगता है कि जिज्ञासा खत्म नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे दब जाती है।
जब बच्चों को बार-बार कहा जाता है कि “इतने सवाल मत पूछो”, “फालतू बातें मत करो” या “अभी परेशान मत करो”, तो वे सवाल पूछना कम कर देते हैं। कई बार उन्हें गलत जवाब देने का डर भी होने लगता है। धीरे-धीरे वे अपनी बात मन में ही रखने लगते हैं।
बच्चों की जिज्ञासा को बचाने के लिए माता-पिता क्या कर सकते हैं?
अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे बड़े होकर सिर्फ किताबों के जवाब याद करने वाले नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाले, नए विचार पैदा करने वाले और आत्मविश्वासी इंसान बनें, तो हमें उनकी जिज्ञासा को बचाने की कोशिश करनी होगी। अच्छी बात यह है कि इसके लिए किसी महंगे कोर्स या विशेष ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है। रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें ही बच्चों की इस सुपरपावर को मजबूत बना सकती हैं।
जब बच्चा सवाल पूछे, तो उसे समय दीजिए
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर बच्चों के सवालों को जल्दी-जल्दी निपटाने की कोशिश करते हैं। कभी हम कहते हैं, “अभी नहीं, बाद में बताऊंगी”, तो कभी जवाब देने की बजाय उन्हें चुप करा देते हैं। लेकिन बच्चे के लिए उसका सवाल बहुत महत्वपूर्ण होता है।
जब कोई बच्चा पूछता है, “आसमान नीला क्यों है?” या “पेड़ चलते क्यों नहीं हैं?” तो वह सिर्फ जानकारी नहीं मांग रहा होता। वह दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा होता है।
हर बार लंबा जवाब देना जरूरी नहीं है। लेकिन इतना जरूर जरूरी है कि बच्चे को महसूस हो कि उसका सवाल महत्वपूर्ण है और उसकी बात सुनी जा रही है। जब बच्चे को यह एहसास होता है कि उसके सवालों की कद्र की जाती है, तो वह भविष्य में भी जिज्ञासु बना रहता है।
हर जवाब देने की बजाय बच्चे को सोचने का मौका दीजिए
अक्सर माता-पिता को लगता है कि अच्छे पैरेंट वही हैं जो हर सवाल का सही जवाब तुरंत दे दें। लेकिन कई बार सबसे अच्छा जवाब कोई जवाब नहीं, बल्कि एक नया सवाल होता है।
अगर बच्चा पूछे, “बारिश कैसे होती है?” तो तुरंत पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया समझाने की बजाय आप पूछ सकते हैं, “तुम्हें क्या लगता है?”
शायद उसका जवाब वैज्ञानिक रूप से सही न हो, लेकिन उस पल उसका दिमाग सक्रिय रूप से सोच रहा होगा। वह अपनी कल्पना का इस्तेमाल कर रहा होगा। यही प्रक्रिया भविष्य में उसकी समस्या सुलझाने की क्षमता को मजबूत बनाती है।
जिन बच्चों को सोचने का अवसर मिलता है, वे केवल जानकारी याद नहीं करते, बल्कि विचार करना भी सीखते हैं।
गलतियों को सीखने का हिस्सा बनाइए
कई बच्चों की जिज्ञासा इसलिए खत्म होने लगती है क्योंकि उन्हें गलती करने का डर सताने लगता है। वे सोचते हैं कि अगर उन्होंने गलत जवाब दिया या कोई गलत काम कर दिया, तो लोग उनका मजाक उड़ाएंगे या उन्हें डांट पड़ेगी।
धीरे-धीरे वे कोशिश करना ही बंद कर देते हैं।
एक बच्चे को यह जानने की जरूरत है कि गलती करना असफलता नहीं है। वास्तव में गलती सीखने का सबसे स्वाभाविक तरीका है।
जब बच्चा कोई नया काम करने की कोशिश करे और सफल न हो, तो उसकी गलती पर ध्यान देने की बजाय उसकी कोशिश की सराहना कीजिए। उसे बताइए कि हर विशेषज्ञ कभी न कभी शुरुआती स्तर पर था। हर सफल व्यक्ति ने असफलताओं का सामना किया है।
जिस घर में गलतियों को सीखने का अवसर माना जाता है, वहां बच्चों की जिज्ञासा और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं।
बच्चों के सवालों को “फालतू” या “बेवकूफी भरा” मत कहिए
बड़ों को कई बार बच्चों के सवाल बहुत अजीब लगते हैं। लेकिन बच्चों के लिए वही सवाल दुनिया को समझने का माध्यम होते हैं।
कल्पना कीजिए कि एक बच्चा पूछता है, “अगर सूरज बहुत गर्म है तो वह जलकर खत्म क्यों नहीं हो जाता?” या “क्या पेड़ों को भी दर्द होता है?”
ये सवाल हमें भले ही अजीब लगें, लेकिन यही सवाल एक बच्चे के सोचने की क्षमता को दर्शाते हैं।
अगर ऐसे समय पर हम कह दें, “क्या बेकार सवाल है”, तो बच्चा धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर सकता है। लेकिन अगर हम उसकी जिज्ञासा की सराहना करें, तो वह और अधिक सीखने के लिए प्रेरित होगा।
कई बार बच्चों को जवाब से ज्यादा इस बात की जरूरत होती है कि कोई उनकी बात को गंभीरता से सुने।
जिज्ञासा की तारीफ कीजिए, केवल उपलब्धियों की नहीं
हम अक्सर बच्चों की तारीफ तब करते हैं जब वे अच्छे नंबर लाते हैं, कोई प्रतियोगिता जीतते हैं या कोई उपलब्धि हासिल करते हैं।
लेकिन क्या हम उनकी जिज्ञासा की भी तारीफ करते हैं?
जब बच्चा कोई दिलचस्प सवाल पूछे, कोई नई चीज जानने की कोशिश करे या किसी समस्या का अपना समाधान खोजने का प्रयास करे, तो उसकी भी सराहना कीजिए।
उसे बताइए कि आपको उसकी सोचने की आदत पसंद है।
ऐसी तारीफ बच्चों को यह संदेश देती है कि केवल परिणाम ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
बच्चों को दुनिया को अनुभव करने दीजिए
जिज्ञासा केवल किताबों से नहीं बढ़ती। यह अनुभवों से भी बढ़ती है।
बच्चों को पार्क में ले जाइए। उन्हें पौधे लगाने दीजिए। रसोई में छोटी-छोटी चीजें सिखाइए। उन्हें बारिश को महसूस करने दीजिए। पक्षियों को देखने दीजिए। मिट्टी में खेलने दीजिए।
जितना अधिक बच्चा वास्तविक दुनिया से जुड़ेगा, उतने अधिक सवाल उसके मन में आएंगे।
और जितने अधिक सवाल होंगे, उतना अधिक सीखना होगा।
खुद भी जिज्ञासु बनिए
बच्चे केवल हमारी बातों से नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार से भी सीखते हैं।
अगर वे देखते हैं कि उनके माता-पिता भी नई चीजें सीखने में रुचि रखते हैं, किताबें पढ़ते हैं, सवाल पूछते हैं और नई जानकारी खोजते हैं, तो वे भी वैसा ही करने लगते हैं।
कभी-कभी अपने बच्चे से कहिए, “मुझे इसका जवाब नहीं पता, चलो साथ में पता करते हैं।”
यह वाक्य बच्चे को दो महत्वपूर्ण बातें सिखाता है—पहली, सब कुछ जानना जरूरी नहीं है; और दूसरी, सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए।
आखिर में…
शायद हमें बच्चों को ज्यादा सिखाने की जरूरत नहीं है। शायद हमें केवल उनकी उस प्राकृतिक जिज्ञासा को बचाने की जरूरत है जिसके साथ वे इस दुनिया में आते हैं।
क्योंकि एक जिज्ञासु बच्चा केवल अच्छे नंबर नहीं लाता, वह अच्छे सवाल पूछता है। और इतिहास गवाह है कि दुनिया को बदलने वाले लोग अक्सर वही होते हैं जिन्होंने सवाल पूछना कभी बंद नहीं किया। ❤️
Your comments and shares do more than just support our blog—they uplift the amazing moms who share their stories here. Please scroll down to the end of the page to leave your thoughts, and use the buttons just below this line to share. Your support makes a big difference!
