बच्चों को कृतज्ञता कैसे सिखाएं
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बच्चों को कृतज्ञता कैसे सिखाएं – 7 आसान तरीके | Momyhood

पिछले हफ्ते मेरे 7 साल के बेटे ने तीसरी बार नया टॉय मांगा — और तीसरी बार मैंने “हां” बोल दिया। रात को जब उसकी अलमारी साफ कर रही थी, देखा कि आधे टॉयज़ तो उसने खोल कर देखे भी नहीं थे। उसी रात खुद से सवाल पूछा — क्या मेरा बेटा जानता है कि उसके पास कितना कुछ है? सच कहूं तो जवाब “नहीं” था।

यहीं से शुरू हुई मेरी तलाश — बच्चों को ग्रेटिट्यूड कैसे सिखाएं, इसकी। और महीनों की कोशिश के बाद जो सीखा, वो आज आपके साथ शेयर कर रही हूं।

ग्रेटिट्यूड कोई गिफ्ट नहीं, एक हैबिट है

पहले मुझे लगता था कुछ बच्चे बस “अच्छे संस्कार” लेके पैदा होते हैं और कुछ नहीं। लेकिन जब मैंने अपने बेटे पे ध्यान से काम करना शुरू किया, समझ आया — ग्रेटिट्यूड जन्म से नहीं आती, इसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा सिखाना पड़ता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हम बच्चे को ब्रश करना या साइकिल चलाना सिखाते हैं — बार-बार, पेशेंस से, बिना थके।

आजकल के बच्चों के लिए ये सीखना पहले से मुश्किल क्यों है

हमारी जनरेशन ने वेट करना सीखा था — दुकान तक जाना, चीज़ का इंतज़ार करना, महीनों बचत करके कुछ खरीदना। आज हमारे बच्चों के लिए हर चीज़ एक टैप जितनी दूर है। मेरा बेटा तो सोच भी नहीं सकता कि कभी ऑर्डर आने में दिन लग जाते थे। और यही वजह है कि अगर हम पेरेंट्स जान-बूझकर स्टेप्स नहीं लेंगे, तो बच्चे कभी समझ ही नहीं पाएंगे कि जो उन्हें इतनी आसानी से मिल रहा है, वो असल में एक प्रिविलेज है, राइट नहीं।

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मैंने घर पर जो 7 आदतें अपनाईं

पैसों की बात उनकी लैंग्वेज में करो

जब बेटे ने एक बार 3,000 रुपये का टॉय मांगा, मैंने डांटा नहीं। बस इतना बताया कि किसी को इतने पैसे कमाने में कितने दिन की मेहनत लगेगी। वो कुछ सेकंड चुप रहा, फिर बोला — “इतना ज़्यादा?” उस दिन के बाद उसने कभी बिना सोचे कुछ नहीं मांगा।

एक बात और ऐड करना चाहूंगी — इंडियन घरों में हम अक्सर बच्चों से मनी टॉक अवॉइड करते हैं, ये सोच कर कि ये “बड़ों की बात” है। लेकिन उम्र के हिसाब से थोड़ी सी इन्फो देना उन्हें रियल वर्ल्ड से कनेक्ट करता है, डराता नहीं।

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थैंक यू बुलवाओ मत, खुद करके दिखाओ

पहले मैं बार-बार याद दिलाती थी — “थैंक यू बोलो।” फिर रियलाइज़ हुआ कि ये तो बस ऑर्डर फॉलो करना है, दिल से शुक्रगुज़ार होना नहीं। अब मैं खुद हर उस इंसान को थैंक यू बोलती हूं जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी आसान बनाता है — उसके सामने ही, बिना सोचे। बेटा बस देखता रहता है — और धीरे-धीरे बिना कहे वो भी वही करने लगा।

बच्चे वो नहीं सीखते जो आप कहते हो, वो सीखते हैं जो आप करते हो।

थोड़ी मेहनत, तभी इनाम

अब घर में कोई भी नई चीज़ यूं ही नहीं मिलती। नई किताब से पहले शेल्फ ठीक करनी होती है, डेज़र्ट से पहले टेबल लगानी होती है। ये पनिशमेंट नहीं है — बस इतना फील करवाना है कि हर चीज़ के पीछे कुछ एफर्ट लगता है।

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रात को एक ग्रेटिट्यूड रिचुअल

सोने से पहले हम दोनों बारी-बारी से एक-एक बात बताते हैं जिसके लिए हम उस दिन ग्रेटफुल हैं। कभी बड़ी बात, ज़्यादातर छोटी-छोटी — जैसे कल उसने कहा “मुझे खुशी है आज बारिश नहीं हुई, मैं क्रिकेट खेल पाया।” बात छोटी हो या बड़ी, फर्क नहीं पड़ता — फर्क पड़ता है रोज़ ये हैबिट रिपीट करने से।

हर इंसान का सम्मान, सिर्फ रिश्तेदारों का नहीं

ये वो पार्ट है जो अक्सर मिस हो जाता है। ग्रेटिट्यूड सिर्फ गिफ्ट्स के लिए थैंक यू कहने तक लिमिटेड नहीं है। मैंने सिखाया है कि घर के आस-पास जो भी लोग हमारी मदद करते हैं, उन सबको उतनी ही इज़्ज़त से नमस्ते करना है, चाहे वो कोई भी हो। रियल टेस्ट तब होता है जब बच्चा उस इंसान से भी अच्छे से बात करे, जो बदले में उसे कुछ नहीं दे सकता।

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कभी-कभी “ना” सुनने देना ज़रूरी है

हर डिमांड तुरंत पूरी करना बंद किया। अब कभी-कभी बेटे को कुछ दिन वेट करना पड़ता है, या अपनी पॉकेट मनी से थोड़ा बचाना पड़ता है। यही वेट वो जगह है जहां असली कद्र पैदा होती है — जो तुरंत मिल जाए, वो कभी प्राइसलेस नहीं लगता।

पीछे की कहानी बताएं

जब मौका मिले, मैं बताती हूं कि वेकेशन के लिए हमने कैसे सेव किया, स्कूल फीस कैसे मैनेज होती है। बच्चे हमसे कहीं ज़्यादा समझदार होते हैं — बस उन्हें चांस चाहिए समझने का।

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क्या सच में फर्क पड़ा?

रातों-रात कुछ नहीं बदला। लेकिन कुछ महीनों बाद, छोटी-छोटी चीज़ें दिखने लगीं। बेटे ने खुद से थैंक यू कहना शुरू किया। उसने दोस्तों के टॉयज़ से अपनी कम्पैरिज़न करनी बंद कर दी। और एक दिन उसने घर की Househelp से खुद ही कहा, “आप थक गए होंगे, बैठ जाइए ना” — बिना किसी के कहे। उस एक लाइन ने बता दिया कि हम सही रास्ते पे हैं।

आखिरी बात

ग्रेटिट्यूड एक दिन के लेक्चर से नहीं आती। ये बनती है रोज़ के छोटे-छोटे पलों से — एक कमेंट, एक हैबिट, रात का एक रिचुअल, किसी को दिया गया एक जेनुइन नमस्ते। कुछ दिन मुझसे भी मिस हो जाता है, कुछ दिन मैं भूल जाती हूं। पर गोल परफेक्ट होना कभी नहीं था — गोल था एक ऐसा बच्चा बड़ा करना जो अपने पास जो है, उसकी कद्र करे, और अपने आस-पास हर इंसान का रिस्पेक्ट करे।

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Namita Aggarwal

I'm a full-time mom and part-time blogger who loves taking care of my 5-year-old and sharing my thoughts through writing. Between the busy moments of motherhood, I find time to connect with other parents through my blog and online communities. I believe sharing real parenting stories and wisdom can help more than general advice, and this is what I try to do through my blog, encouraging parents to join in and share their experiences. I also enjoy teaching art to kids, helping them explore their creativity with colors and shapes.

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